Featured Poem: On Child Labour (Hindi)

बचपन की याद

बचपन की गलियों में
खो गई थी मेरी आवाज़ –
माता पिता ने निकाल दिया था मुझे
समझ के घर का जाबाज़।

उन मासूमियत के पलों में
लगा दिया मुझे खेती और हलों में।
नाज़ुक हाथों से मेरे छीन लिया था बचपन
सोच के वो पल, रुक जाती है मेरी धड़कन।

पर गलती शायद नहीं थी उनकी
पेट भर के सो सकूँ, यही चाह थी उनकी।
बनूँगा मैं काबिल एक दिन
इसी उम्मीद से साफ़ किए लोगों के डस्टबिन।

बचपन की गलियों में ही
खो गई थी मेरी आवाज़ –
कमाने चार पैसे जब​
निकल गया था यह नन्हा जाबाज़।


रौनक सिसोडिया

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